डर के आगे जीत है (संस्मरण)

लोधी डॉ. आशा 'अदिति'

रचनाकार- लोधी डॉ. आशा 'अदिति'

विधा- अन्य

आज सोशल मीडिया पर एक मित्र द्वारा प्रेषित ये फोटो देखकर मुझे अपना बचपन फिर से याद आ गया… कुछ दर्द भरा बचपन…. ना ना ना… गलत ना सोचे…..मेरा बचपन बहुत सुहाना था….पर कुछ दर्द वाली यादें भी हैं…. जिन्हें अब याद करके मुस्कराहट अपने आप ही होंठो पर आ जाती है और सोचती हूँ कितनी डरपोक थी मैं…..फिर लगता है सभी को डर तो लगता ही है…..किसी को छोटी बात पर और किसी को बड़ी बात पर…..

कुछ ऐसी ही, फोटो वाले बच्चे जैसे ही, थी मैं भी बचपन में…… इंजेक्शन से डर या यूँ कहूँ हौवा था मेरे लिए बचपन में…. देखते ही शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती थी, दर्द महसूस होने लगता था…. डॉक्टर के क्लीनिक जाने से पहले ही रोना चालू हो जाता था…..उन दिनों हमारे पारिवारिक डॉक्टर पटेल अंकल थे…..मेरी प्रिय सहेली रजनी के पापा….अंकल हमेशा इंजेक्शन लगाने के पहले कहते बेटा इधर मत देखो….कुछ नही होगा….बस चींटी के काटने से भी कम दर्द होगा….पर अंकल को मैं कैसे समझाती कि मेरे लिए ये छोटा सा दर्द किसी बड़े ऑपरेशन के दर्द से कतई कम नही था…..

उन दिनों स्कूल में टीके लगाये जाते थे ….. मुझे याद आ रहा है ऐसे ही एक साल जब पहली बार स्कूल में बच्चों को टीके लगने वाले थे….पहले से पता तो नही था….पर जैसे ही पता चला सभी को इंजेक्शन लगने वाले हैं…फिर क्या था मुझे तो सिर्फ क्लास की खिड़कियां दिख रही थी क्योंकि दरवाजे पर तो आचार्य जी खड़े थे….फिर क्या था मौका मिला और फांद ली स्कूल की खिड़की और घर पहुँच कर ही चैन की साँस ली…..पर इतनी आसानी से हम कहाँ बचने वाले थे….दूसरे दिन, जिन बच्चों को टीके नही लगे थे उन्हें फिर से कतार में खड़ा किया गया….अब क्या, हमें तो काटो तो खून नही….आज तो भागने का भी सवाल नही था क्योंकि लाइन में बच्चे कम थे….सब पर नजर थी….पर हम भी कहाँ हार मानने वाले थे….वो रोना-धोना मचाया कि आखिर डॉक्टर को कहना पड़ा "तुम तो रहने दो बेटा"….और हम बच गए उस भयानक दर्द से….अगले साल से तो पहले से ही पता करके रखते कि टीके कब लगने वाले हैं और उसके 2-3 दिन तक हमारी स्कूल की छुट्टी….

एक साल हमें बहुत ज्यादा खांसी हो गई थी…पटेल अंकल ने पापा को बताया कि बिना इंजेक्शन के ठीक नही होगा….. वो भी एक दो दिन नही, पूरे 30 दिन तक लगातार इंजेक्शन लगने थे….अब तो आप समझ ही गए होंगे हमें उस क्षण कैसा महसूस हो रहा होगा….उस दिन जो दहाड़े मार मार के रोये कि थक कर अंकल को दवाइयाँ ही देनी पड़ी….और हम ढेर सारी कड़वी दवाइयाँ खाकर भी खुश थे कि मुई सुई के दर्द से तो बचे…..

हमारे इस डर ने काफी बड़े होते तक हमारा साथ नही छोड़ा….फिर वो वक़्त भी आया जब लगा इस डर के आगे आने वाली ख़ुशी नन्ही सी जान की सेहत ज्यादा जरुरी है…..उस समय बड़ा बेटा हमारे परिवार का हिस्सा बनने वाला था….टिटेनस का पहला इंजेक्शन लगने वाला था..पहले तो साफ़ मना कर दिया….नहीं लगवाएंगे इंजेक्शन…पर नन्ही सी जान का ख्याल आते ही थोड़ी हिम्मत जुटाई……फिर क्या था अपने आप को मजबूत किया और जोर से आँखे बंद कर ली…… और आँख तब ही खोली जब डॉक्टर ने कहा…. हो गया अब उठ जाइये….अरे ये क्या हमें तो पता ही नही चला कि कब इंजेक्शन लग गया, दर्द होना तो दूर की बात है…..उस दिन अपने आप पर बहुत हँसी भी आई कि आज तक खामखाँ ही हम डरते रहे…..उस दिन खुश थे कि चलो छोटी सी जान के कारण ही सही आज इस डर पर जीत हमने पा ही लिया….

उसके बाद आज तक इंजेक्शन से कभी डर नही लगा….और इंजेक्शन से डरने वाली लड़की ने पड़ोसन को आपरेशन में ज्यादा खून बह जाने पर पहली बार रक्तदान भी किया…..और उस दिन के बाद से नियमित रूप से रक्तदान भी करती रहती हूँ…रक्तदान करते समय हाथ में लगी सुई और बोतल में जाते खून को देखकर डर नही लगता और ना ही दर्द होता है, बल्कि एक अजीब सी ख़ुशी का अनुभव होता है….

क्या आपने अपने डर पर जीत हासिल कर ली?….क्या आपने उस अजीब सी ख़ुशी का अनुभव लिया है?….अगर नही तो कभी जरूर लीजियेगा….बहुत अच्छा लगता है…..

——-लोधी डॉ. आशा 'अदिति'

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लोधी डॉ. आशा 'अदिति'
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मध्यप्रदेश में सहायक संचालक...आई आई टी रुड़की से पी एच डी...अपने आसपास जो देखती हूँ, जो महसूस करती हूँ उसे कलम के द्वारा अभिव्यक्त करने की कोशिश करती हूँ...पूर्व में 'अदिति कैलाश' उपनाम से भी विचारों की अभिव्यक्ति....

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