>>> जैहिंद के दोहे

दिनेश एल०

रचनाकार- दिनेश एल० "जैहिंद"

विधा- दोहे

जैहिंद के दोहे —-

नेतवन से जनता का, कब भंग होइ मोह ।
कब ले सोइहैं जनता, कब लिहैं ठौर-टोह ।।

पूजा, टोना, टोटका, नाहिं काऊ सुहाय ।
झूठे लोगवा पूजै, मनवा छनिक भुलाय ।।

काहु नाहिं पूछिहैं रे, _ बिन तोहे सिंगार ।
तू जे सिंगार करिबै, लखिहैं लाख-हजार ।।

बड़ सजैबे कापड़ से, अरु करबे सिंगार ।
एक दिन नंगे जइबै, लिंहैं कापड़ उतार ।।

कुरसी पाई पगलाय, अँखियाँ मूँदी सोय ।
भाँड़ में गइलैं जनता, मंतरी चाँदी होय ।।

जीवन-मरन बस दूई, जीवन के है सार ।
इंतकाल जे होइहैं, __लगिहैं कांधे चार ।।

भज प्यारे श्रीराम तू, ले तनिक गति सुधार ।
बनके सज्जन क्षण भर, कर ले तनिक विचार ।।

भेद…ना जानत मनुवा, भगवन..अभेद होय ।
लौकिक जानत लोगवा, अलौकिक नाहिं कोय ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
03. 10. 2017

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दिनेश एल०
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मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का अंग बना लिया और निरंतर कुछ न कुछ लिखते रहने की एक आदत-सी बन गई | फिर इस तरह से लेखन का एक लम्बा कारवाँ गुजर चुका है | लगभग १० वर्षों तक बतौर गीतकार फिल्मों मे भी संघर्ष कर चुका,,

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