जी करता है…..

हरीश लोहुमी

रचनाकार- हरीश लोहुमी

विधा- अन्य

फैला कर बाहें,
बिखरे हुए जज्बात को समेट लूं,
जी करता है,
तुम्हें अंग-अंग में लपेट लूं.

बदल दूं फाल्गुनी राग,
नई मल्हार जगा दूं,
दिल की धुन में बहक-बहक,
तार-तार खनका दूं .

इस कदर हो जाऊं तुम पर न्यौछावर,
रग-रग में जंग भर दूं,
खुद रँग जाऊँ रंग तुम्हारे,
रोम-रोम तुमको रँग दूं.

***** हरीश चन्द्र लोहुमी

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हरीश लोहुमी
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।

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One comment
  1. सबसे पहले हरीश जी आपका हार्दिक स्वागत । आपको यहाँ देखकर कितनी ख़ुशी हुई बता नही सकती । अब आपकी सुन्दर रचनाओं का लुत्फ़ उठाने का मौका मिलेगा । बहुत सुन्दर रचना है आपकी । दिल से बधाई आपको ।