*जीव का अपना अस्तित्व है जीवन*

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

**खुले आसमां में उड़ता ..हुआ परिंदा हु**
पानी में तैरता हुआ खाली पत्र हु
अग्नि में तपकर बनता सोना हु
पत्थरों में हीरा हु ..खुद की रोशनी हु
लोहे को स्वर्ण में ढ़ाल दे ..वो पारस हु
चट्टानों से टक्कर लेता तूफान हु
गगन का चमकता तारा हु
दिशा को इंगित करता ध्रुव तारा हु
सूरज की चमक ..चांद की शीतलता हु,
बदलते दिन और रात
बनते बिगड़ते मौसम की सोपान हु
मानो तो हर आयोजन मुझसे है,
मै जीवन हु
मै ही जीवंत हु
मुझ से ही है चेतना,
मैं ही चेतन हु
आकाश मेरा स्वभाव,
खुले में जीता हु,
घुट-घुट कर जीने से मैं घटता हु

डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
महादेव क्लीनिक,
मानेसर व रेवाड़ी(हरीयाणा).

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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