जीना इसी का नाम है

अनुजा कौशिक

रचनाकार- अनुजा कौशिक

विधा- कविता

ज़िन्दगी दो पल की ये कभी समझ नहीं आयी
काश ऐसा होता..काश वैसा होता
यही उधेड़बुन कभी सुलझ न पायी

जाने वाला कल और आने वाला कल
क्यों बस याद रहे हर पल
जीना सीख लिया मैंने ये जान लिया अब
मेरे आज में ही हैं मेरी मुश्किल के हल

ज़िन्दगी दो पल की….

कभी जब मन मेरा भरमाया
जीवन बुरी तरह लड़खड़ाया
मैंने खुद ही खुद को समझाया
बहुत बांटना चाहा अपनों के संग
तब कोई अपना काम न आया
मन बार बार कहे यूं मुझसे
क्यों तूने अपना दिल ही दुखाया

ये ज़िन्दगी दो पल की..

कभी हार गया मन..कभी टूट गया दिल
अपना अस्तित्व ही जैसे गया हो हिल
ज़िन्दगी भी जब लगने लगी मुझे मुश्किल
ईश्वर के फ़ैसले में ही दिखी तब मंजिल
सोचा जी ले इंसां क्यों बना है यूं तू बुजदिल

ये ज़िन्दगी दो पल की…

रिश्तो के भँवर में जब भी मन घबराया
अपनों ने ही जब नज़रों से गिराया
इक आंसू भी नैंनों से बाहर न आया
अकेलेपन ने भी हरदम तड़पाया
बस ईश्वर ने ही मेरा साथ निभाया

ये ज़िन्दगी दो पल की..

अकेला चल..जीवन ने बस यही है सिखाया
खुद गिरना और उठना है..अन्तर्मन ने बस यही समझाया
कर खुद पर ही बस ऐतबार, बन अपना ही साया
ये जीवन है बस ईश्वर की एक मोह माया
मैं कायर नहीं जो मुश्किल देख घबराया
माना अँधेरा है हर तरफ़..उदासियों में है दिल घिर आया
मैंने फ़िर भी मौत नहीं जीवन है अपनाया
©® अनुजा कौशिक

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अनुजा कौशिक
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मैं एक प्रोफ़ेश्नल सोशल वर्कर हूं..ज़िन्दगी में होने वाले अनुभवों और अपने विचारों की अभिव्यक्ति अपने लेखों और कविताओं के माध्यम से कर लेती हूं..

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