जि़द….!!

yashwant viran

रचनाकार- yashwant viran

विधा- कहानी

एक साधारण जिद्दी कहानी……"जिद…!!"

नवाब साहब के एक हादसे में इंतकाल हो जाने के बाद रियासत वज़ीरनगर की बेगम हैं रज़िया परवीन। पचास-साठ की उम्रदराज़ एक जवान बेटे गुलफाम की अम्मी। जिसे वो प्यार से लाडले नवाब कह कर बुलाती थी।नवाब की मौत के बाद बेगम खुद को बेसहारा महसूस करती हुई अपने बिगड़ैल बेटे की हर खता को माफ़ करते हुए वक़्त गुजार रहीं थी। अम्मी के लाड और बाप के साये से महरूम गुलफाम जिद्दी हो गया था। उसके दो ही शौक़ हैं एक घुड़सवारी करना और दूसरा हर शाम कोठी पर शराब और शबाब की महफ़िल सजाना। बेगम साहिब को गुलफाम का ये दूसरा शौक नागवार गुजरता पर अपनी औलाद की दिली हालत से वाकिफ उसके इस शौक को नज़रंदाज़ कर देती।
गुलफाम रोज अपने अजीज दोस्त अहमद, जो उसके साथ ही कोठी पर हरवक्त साये की तरह रहता है,के साथ घुड़सवारी के लिए निकल जाता। सुना जाता है कि नवाब साहब के साथ गुज़रे हादसे वाले दिन अहमद ने भी अपना परिवार खो दिया था,चूँकि इस हादसे की वज़ह नवाब साहब के परिवार से ताल्लुक रखती थी,इसलिए
गुलफाम की जिद पर उसके दोस्त अहमद को अनाथ हुआ जानकर बेगम साहिबा अपने साथ कोठी पर ले आई थीं और तभी से अहमद गुलफाम के साथ ही पल-बढ़ कर जवान हुआ है। इस हादसे को गुजरे लगभग 15-16 साल बीत चुके हैं। गुलफाम की घुड़सवारी का शौक हो या शाम की महफ़िल बिना अहमद के अधूरी थी।

गुलफाम की एक जिद और थी कि हर शाम उसकी महफ़िल में एक नया चेहरा ही पेश होना चाहिए क्योंकि उसके अंदर एक अजीब सा वहम जूनून की हद तक सवार था। वह केवल एकबार ही नाचनेवाली का चेहरा देखता और उसे दोबारा अपनी महफ़िल में देखना पसंद नहीं करता।उसका मानना था कि किसी होंठों को एक बार चूमनें के बाद वो जूठे हो जाते हैं और उसे जूठन खाने की आदत नहीं है।अहमद न चाहते हुए भी अपने दोस्त की जिद को किसी तरह पूरी करता और रियासत वज़ीर नगर ही नहीं आस-पास के इलाकों से नया चेहरा खोज कर उसकी महफ़िल में हाजिर करता।
गुलफाम जब किसी हसीन चेहरे को देखता तो उसके दिल में एक तड़प सी उठती और वो बेतहाशा पीने लगता,उसी नशे में बेसुध हो कर नाचने वाली के आगोश में गिर कर अपने होश खो देता। यह बात केवल बेगम साहिब के सिवा हरवक्त साथ रहने वाला दोस्त भी आज तक नहीं जान सका था कि गुलफाम ऐसा क्यों करता है..?
रियासत में बाई कनीजबानों आती है। कनीजबानों एक मशहूर कोठे वाली है जिसके पास देश-विदेश की हसीन जवान और ख़ूबसूरत चेहरे हैं। अहमद कनीजबानों से मिलता है कि उसे अपने नवाब की महफ़िल के लिए हर शाम एक खूबसूरत नगीना चाहिए,शर्त ये है कि महफ़िल में एक बार शिरकत करने के बाद वो चेहरा दोबारा पेश नहीं होना चाहिए।इनाम-इकराम दिल खोलकर मिलेगा। कनीजबानों राजी हो जाती है,भरपूर ईनाम के लालच में वह अपनी दूसरी बाईयों को खबर भिजवा देती है कि जरुरत पड़ने पर नए चेहरों का इन्तेजाम रखा जाए।

इन्हीं हसीन चेहरों में एक चेहरा था… फ़िरदौस। एक शफ्फ़ाक संगेमरमर की नायाब मूरत,जिसे शायद खुदा ने खुद अपने हांथों से फुरसत में तराशा था। जैसी सूरत वैसी ही सीरत जो भी उसे देखता दीवाना हो जाता।बाई कनीजबानों की लाड़ली थी…फ़िरदौस।जिसे वह अपनी बेटी मानती थी और बहुत ख़ास मौके पर ही उसे महफ़िल में भेजती या यूँ समझ लीजिये जब किसी मालदार अमीर या शौक़ीन नवाबों की कोई महफ़िल सज़ती और उसे फ़िरदौस की अदाओं से महफ़िल के साथ मेज़बान की जेबों को भी लूटना होता तभी वहाँ वह उसे भेजती थी। वही फ़िरदौस एक दिन नवाब गुलफाम की महफ़िल में भी पेश होती है।गुलफाम जब उसके खूबसूरत चेहरे को देखते हुए उसकी आँखों में झांकता है तो पता नहीं गुलफाम को क्या हो जाता है वह एक झन्नाटेदार तमाचा फ़िरदौस के खूबसूरत चेहरे पर जड़ देता है और बेतहाशा जाम पर जाम पीने लगता है।
आवाक सी खड़ी फ़िरदौस…जिसे अपने हुस्न और हुनर पर पूरा भरोसा था अचानक हुए इस घटनाक्रम से सन्न रह जाती है वह सहारा पीते हुए गुलफाम को गौर से देखती है और फिर रोती हुई महफ़िल से चली जाती है।
इसी दरमियान अपनी औलाद की हरकतों से कुढ़कर बेगम खुदा को प्यारी हो जाती हैं।
कोठी कुछ शामें सन्नाटे में गुज़रती हैं..!
फ़िरदौस समझ नहीं पा रही थी कि गुलफाम ने उसके साथ ऐसा क्यों किया।वह गुलफाम से दोबारा मिलकर इस बारे में पूंछना और बात करना चाहती थी,उसने गुलफाम के पास पैगाम भिजवाया जिसे गुलफाम ने ठुकरा दिया। लेकिन फ़िरदौस पैगाम पर पैगाम भिजवाती रही कि जिसे गुलफाम
वो केवल एक बार उससे मिलना और बात करना चाहती है मगर गुलफ़ाम उसके हर पैगाम को ये कह कर ठुकरा देता कि उसे जूठन खाने की आदत नहीं है।लेकिन फ़िरदौस उसे पैगाम भिजवाती रही।
फ़िरदौस की हरकतों से परेशान होकर गुलफाम अहमद को कनीजबानों के पास भेजता है कि वह फ़िरदौस की हरकतों पर लगाम लगाये।अहमद की शिकायत पर कनीजबानों फ़िरदौस को समझती है-"बेटी हम कनीज़ों की औक़ात इन नवाबों के सामने एक नाचनेवाली से ज्यादा नहीं होती,उनका दिल बहल जाने के बाद वे हमें जूठे बर्तन की तरह छोड़ देते हैं या खाली जाम की तरह तोड़ देते हैं।"लेकिन फ़िरदौस को इन बातों से अपनी जिल्लत महसूस होती है उसे लगता है कि गुलफाम नवाबी के गुरुर में उसके हुस्न और हुनर की नाकदरी कर रहा है,उसने भी जिद ठान ली कि अब वह गुलफाम को हासिल करके ही छोड़ेगी भले ही इसके लिए उसे मौत को ही गले क्यों न लगाना पड़े।वह गुलफाम की जिद तोड़कर ही मानेगी।
दोनों ही अपनी जिद पर अड़ गए।
गुलफाम फ़िरदौस की जिद से तिलमिला उठा,अहमद से बोला की जाकर इस लौंडिया को समझाए की वह तुम्हारे दोस्त की दिमागी परेशानी को और न बढ़ाये।अपने अज़ीज दोस्त को परेशान देखकर अहमद तमतमाते हुए कनीजबानों को समझता है कि अपनी उस नादान लड़की को समझा लो वरना अंजाम अच्छा न होगा।अभी उसकी बात पूरी भी नहीं होती है कि अंदर से बिफरती हुई फ़िरदौस अहमद के सामने आकर खड़ी हो जाती है"वरना..वरना…. क्या..?तुम मर्द लोग अपने आप को समझते क्या हो…-हम खिलौने हैं… क्या..?जब तक मर्जी हुई खेला और जब मन भर गया तो ठुकरा दिया..!!अहमद साहब हम भी इंसान है और हम भी सीने में दिल रखते है दिल कोई पत्थर का टुकड़ा नहीं…समझे !" अहमद फ़िरदौस के इस तरह बात करने के अंदाज़ को देखकर नाराज़ हो कर चीखता है…"गुस्ताख़..-लड़की!!"और उसका एक हाँथ हवा में उठ जाता है.. "मारो लो मारो..!!"कहते हुए फ़िरदौस अपना चेहरा आगे बढ़ा देती। अहमद गुस्से से तमतमाते फ़िरदौस के चेहरे को ध्यान से देखता है अचानक उसकी आँखें उसके चक्रे पर ठहर कर सिकुड़ सी जाती है,उसका उठा हुआ हाथ अपने आप नीचे आ जाता है और वह एक हारे हुए सिपाही की तरह वहाँ से वापस लौट आता है।
उसी रात एक साया छुपता-छुपाता कनीजबानों के कोठे पर दाखिल होता है,उसकी कनीजबानों से गुपचुप सी कुछ बात होती है.. फिर वो साया कनीजबानों के हांथों को चूमकर कुछ कहता है दोनों की आँखों में आंसूं हैं। उन्हें ये खबर नहीं होती कि कोई तीसरा भी दरवाजे की ओट से उन दोनों की बातें सुन रहा है।
अहमद की आँखों से नींद गायब हो चुकी है,गुज़रा वक़्त उसकी आँखों में तस्वीर बनकर उतर आया है,तब उसकी उम्र ही क्या थी यही 15-16 के आस-पास,तभी दरवाजे पर दस्तक होती है,दरवाजा खोलते ही उसे स्याह लबादा ओढ़े फ़िरदौस सामने नज़र आती है जो तेजी से उसे धकेलती हुई अंदर आ करके अपना लबादा एक तरफ फेंक कर उसके सीने से लिपटकर रोने लगती है. ,अहमद की आँखों से भी अश्क़ बहकर उसकी घनी बढ़ी हुई दाढ़ी में खोने लगते हैं…!दोनों कुछ देर कुछ बातें करते है अचानक बाहर कोई आहट सुनकर फ़िरदौस उसी लादे को ओढ़कर दरवाजे से बाहर निकल कर घने अँधेरे में खो जाती है।
आज शाम फिर कोठी पर महफ़िल सजी हुई है। गुलफाम ने अहमद को सख्त हिदायत दी है कि वह फ़िरदौस का चेहरा यहां दोबारा न दिखाई दे।गुलफाम शराब पीने लगता है तभी परदे के पीछे से घुंघरू की आवाज आरी है और नकाब पहने एक नाचनेवाली अपने जलवे बिखेरने लगती है…. लड़खड़ाते झूमते गुलफाम उसके करीब आता है "मेरी महफ़िल नकाब नहीं शबाब की महफ़िल है.. कहकर उस नाचनेवाली के चेहरे से नकाब खींच लेता है…!"चेहरा सामने नज़र आते ही वह चीख पड़ता है…"फ़िरदौस तुम…!" "अहमद…….!!" वह जोर से चिल्लाता है। "इसे यहां.. से बाहर निकालो… अहमद। ..तुरन्त ..!!"उसको चीखते देखकर अहमद हँसता है….. ।किसे… बाहर निकालूँ… गुलफाम…..!!फ़िरदौस को या तुम्हारी हमीदा को….!!"कोई जवाब न देकर गुलफाम फ़िरदौस को घूरते हुए महफ़िल से चला जाता है…!
पीर साहब की मज़ार पर उर्स लगा हुआ है। अहमद मज़ार पर माथा टेकता है… उसके होंठ कुछ बुदबुदा रहे हैं… "मेरे मालिक … मेरे परवरदिगार…मुझसे उन दोनों की तड़प सहन नहीं हुई मैंने उन दोनों को उनके दर्द से निजात दे दिया…!!जो गुनाह दो जिद्दी जिस्मों की बेगुनाह रूह को सुकून दे सत्ता था मैंने कर दिया… हो सकता है तू मेरे इस गुनाह को माफ़ भी कर दे.. लेकिन मैंने खुद अपनी सज़ा मुक़र्रर कर ली है…आमीन..!!"और यह कहते हुए वह मुठ्ठी में दबी शीशी को होंठो से लगा कर पी जाता है…. कुछ देरछटपटाकर अपने सीने को हाँथ से दबा कर वहीँ पर लुढक जाता है।
तभी दौड़ता हुआ एक आदमी अहमद के पास आता है "अहमद भाई.. अहमद भाई… कोठी में नवाब गुलफाम और फ़िरदौस बी की लाशें पड़ी हैं और तुम…" कहते हुए अहमद को हिलाता है कई हरकत न देख "और यार तुम भी….!!" .
VIRAN

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