जिम्मेदारी किसकी….?

पं.संजीव शुक्ल

रचनाकार- पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

विधा- लेख

आज मै वसुधा जी का एक लेख पढ रहा था फेसबुक पर तभी मेरे दिमाग का कीड़ा कुलबुलाया और मैनें तुरन्त ही उस पोस्ट की पोस्टमार्टम करने की ठान ली।
सबजेक्ट था बालीवुड के द्वारा परोसे जा रहे नग्नता के संदर्भ में। माना दिन ब दिन बालीवुड नायिकाओं के वस्त्रों को छोटा और छोटा किये जा रहा है , जिस दृश्य को पहले पेड़ो के ओट में फिल्मा कर उनके स्थान पर दो फुलों को एक साथ दिखाकर प्रेम या मिलन के भाव दर्शाये जाते थे आज उन अन्तरंग दृश्यों को खुलेआम पर्दे पर दिखाया जाने लगा है, हर एक फिल्म में आईटम सांग के नाम पर फुहड़ता परोसा जाने लगा है यहाँ तक की कल तक जिन द्विअर्थी बातों के लिए हम अपने बच्चों को असभ्य कह कर डांट दिया करते थे आज वहीं बातें इन फिल्मों में सुपरहिट डायलॉग का स्थान प्राप्त कर भरपूर सोहरत बटोर रहीं है।
हाल फिलहाल में हीं एक बहुत बड़े स्टार के फिल्म का एक डायलॉग तहलका मचा रखा था " तुममें हम इतना छेद करेंगे कि कन्फ्यूज हो जाओगे कि सांस कहाँ से लें और………….।
दोस्तों मै आपसे मुखातिब हो यह प्रश्न करता हूँ कि इस नग्नता, इस फुहड़ता के लिए क्या केवल बालीवुड वाले, टालीबुड वाले, भोजुबुड वाले ही जिम्मेदार हैं या कहीं ना कहीं हम सब भी इसके लिए समान रुप से जिम्मेदार हैं।
आज की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि हम उन्हीं फिल्मों को पसंद करते हैं जिसमें नग्नता, फुहड़ता , द्विअर्थी भाषा का कूट कूट कर पूरे सलीके से समावेश किया गया हो।
उन्हीं गानों को पसंद किया जाने लगा है जो अश्लीलता की पराकाष्ठा को पार करती हों
अब आप भोजपुरी गानों को हीं ले लें कल तक जिन गानो को सुनकर मधुरता का बोध होता था वहीं आज के गाने उन्माद पैदा करने लगे हैं, सभ्यता , संस्कृति को तार-तार करते ये गाने आज धड़ल्ले से बीक भी रहे है और सार्वजनिक स्थलों पर सुने भी जा रहे हैं।
नग्नता आज फिल्मों का, गानों के कामयाबी का सबसे मुख्य व अहम शस्त्र बन गया है और सभी प्रोडक्शन कम्पनियां, म्यूजिक कम्पनियां इन शस्त्रों का भरपूर उपयोग कर अपना ऊल्लू सिधा करने में लगी है।
जिन फिल्मों में, जिन गानों में , इन विंदुओं का तड़का न लगा हो वे बाँक्स आफिस पें औधे मुंह गीरती है और पानी तक नहीं मांगती।
ऐसा नहीं है कि बालीवुड समाजिक , देशभक्ति, सांस्कृति प्रधान, साफसुथरी फिल्में नहीं बनाता, ऐसी फिल्में भी प्रति वर्ष थोक के भाव बनती व प्रदर्शित भी होती हैं किन्तु उनका हश्र क्या होता है यह सबको पता है।
अब मेरे भाई वे भी तो बिजनेसमैन ही है और घाटे का सौदा भला कौन करना चाहता है आज जो बीक रहा है वहीं वो बेच रहे है।
अगर इन सब से निजात पाना है तो आप खरीदना बंद कर दे वो बेचना बन्द कर देंगें।
हम जो सुधरे तो यकीन जानिये सुधार खुद बखुद होने लगेगा।
बाकी समझदार तो आप सब भी है।
जय हिन्द।
पं.संजीव शुक्ल"सचिन"

Views 9
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
पं.संजीव शुक्ल
Posts 71
Total Views 505
मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia