जिन्दगीं में और आफत अब न हो

बसंत कुमार शर्मा

रचनाकार- बसंत कुमार शर्मा

विधा- गज़ल/गीतिका

हो चुकी जो भी सियासत अब न हो
मुल्क से मेरे बगावत अब न हो

आपको सौंपा है’ दिल अनमोल ये
इस अमानत में खयानत अब न हो

हमसे’ पीकर दूध हमको ही डसें
ऐसे’ साँपों की हिफाजत अब न हो

हम मरें जिन्दा रहें कुछ गम नहीं
गीदड़ों की बादशाहत अब न हो

जो लड़ा आपस में’ दे हमको यहाँ
धर्म की ऐसी तिजारत अब न हो

बचपने से पचपने तक सब सहीं
जिन्दगीं में और आफत अब न हो

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बसंत कुमार शर्मा
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भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, गीत, गजल/गीतिका, दोहे, लघुकथा एवं व्यंग्य लेखन

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