*” जिओ और जीने दो “*

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

*"जिओ और जीने दो"*

आखिर कब तक मातम मनाते रहोगे,
गाड़ी चलाते हुए फ़ोन पर बातें कर कर,
मौत के आग़ोश मे सोते ..सुलाते रहोगे,
आखिर कब तक ?

सिगरेट और फ़ोन का शौक जाने क्यों ?
गाड़ी में बैठते ही …..याद आता है ?
जो शौक "शोक और काल़" के कारण बन जाते हो,जिम्मेदारी लेने की बजाय दोष,
विधाता पर …………धरते हो,

पी ली है शराब गम भुलाने को
या खुश थे बहुत अधिक ..तो क्या ?
औरों कि खुशियाँ मिटाओगे,
जो सोए है जो मुसाफिर,
फुटपाथ पर
उनकी जिंदगी से हाथ धोवोगे,

जीओ और जीने दो,
डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
महादेव क्लीनिक, मानेसर व रेवाड़ी(हरि.)

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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