जिंदगी की रेस

DESH RAJ

रचनाकार- DESH RAJ

विधा- अन्य

दूर तक बस केवल एक सन्नाटा नज़र आता है,
सन्नाटे में आदमी को सिर्फ भागते हुए पाता हूँ I

जिंदगी को रेस बनाकर हम कहाँ दौड़ते जा रहे ?
कहाँ जाना ?क्या पाना ? हम नहीं समझ पा रहे,
अंधी दौड़ प्रतियोगिता में बस भागते हुए जा रहे ,
इंसानियत से दूर आग के दरिया में समाते जा रहे I

दूर तक बस केवल एक सन्नाटा नज़र आता है,
सन्नाटे में आदमी को सिर्फ भागते हुए पाता हूँ I

“राज” एक दिन तुझे भी इस “ जहाँ ” को छोड़कर है जाना,
प्यारी जिंदगी को “दुनिया की रेस” बनाकर दौड़ मत लगाना,
मुट्ठी बांधकर आया था दुनिया में, हाथ फैलाकर तुझे है जाना ,
“ इंसानियत का दामन” थाम ले,तुझे “प्रभु” की नगरी है जाना I

दूर तक बस केवल एक सन्नाटा नज़र आता है,
सन्नाटे में आदमी को सिर्फ भागते हुए पाता हूँ I

देशराज “राज”

Views 129
Sponsored
Author
DESH RAJ
Posts 15
Total Views 1k
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia