जादुई फल मांगता हूँ ……………….(ग़ज़ल )

डी. के. निवातिया

रचनाकार- डी. के. निवातिया

विधा- गज़ल/गीतिका

जादुई फल मांगता हूँ ……………….(ग़ज़ल )

ऊब गया हूँ बेजुबानो की भीड़ में रहकर तन्हा
अब अकेले में जश्न के लिए दो पल मांगता हूँ !!

पत्थर सा बन गया हूँ देखकर बेदर्द जमाने को
नयनो के समुन्द्र से अंजुली भर जल माँगता हूँ !!

बर्बाद हो गया हूँ बहकर बदलाव की इस लहर में
रास नहीं आता आज, बीता हुआ कल मांगता हूँ !!

नफ़रतो के साये में खौफजदा है हर एक रूह
बदल जाए नजरिया आतंक का हल मांगता हूँ !!

हर तरफ खिले हो गुलशन में गुल मोहब्बत के
नीरस जिंदगी में अब वो हसीन पल मांगता हूँ !!

कोई दौलत ना जागीर चाहिये “धर्म” को यारो
मिटादे जहन से नफरत, वो जादुई फल मांगता हूँ !!
!
!
!
डी. के. निवातियाँ ____________@@@

Views 26
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
डी. के. निवातिया
Posts 168
Total Views 20.4k
नाम: डी. के. निवातिया पिता का नाम : श्री जयप्रकाश जन्म स्थान : मेरठ , उत्तर प्रदेश (भारत) शिक्षा: एम. ए., बी.एड. रूचि :- लेखन एव पाठन कार्य समस्त कवियों, लेखको एवं पाठको के द्वारा प्राप्त टिप्पणी एव सुझावों का ह्रदय से आभारी तथा प्रतिक्रियाओ का आकांक्षी । आप मुझ से जुड़ने एवं मेरे विचारो के लिए ट्वीटर हैंडल @nivatiya_dk पर फॉलो कर सकते है. मेल आई डी. dknivatiya@gmail.com

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia