ज़िन्दगी

विवेक दुबे

रचनाकार- विवेक दुबे

विधा- कविता

ज़िन्दगी को न समझ सकी ज़िन्दगी ।
बस इस तरह कटती रही ज़िन्दगी ।।
करती रही वादे बार बार ज़िन्दगी ।
अनसुलझी सी रही फिर भी ज़िन्दगी ।।
पाकर ख्याल खो गईं हक़ीक़तें ।
क्यों ख़्याल पालती रही ज़िन्दगी ।।
पढ़ी थी किताबों में जो आज तक ,
बस बेहतर तो बही थी ज़िन्दगी ।।
जी रही दुनियाँ दुनियाँ के वास्ते ,
फिर भी दुनियाँ में नही ज़िन्दगी ।।
रूठता क्यों है तू अपने आप से ,
तेरे ही वास्ते तो जी रही यह ज़िन्दगी ।।
….. विवेक ….

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विवेक दुबे
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मैं विवेक दुबे निवासी-रायसेन (म.प्र.) पेशा - दवा व्यवसाय निर्दलीय प्रकाशन द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से सम्मान का गौरब पाया कवि पिता श्री बद्री प्रसाद दुबे "नेहदूत" से प्रेरणा पा कर कलम थामी काम के संग फुरसत के पल कलम का हथियार ब्लॉग भी लिखता हूँ "कुछ शब्द मेरे " नाम से vivekdubyji.blogspot.com
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