ज़िन्दगी की उलझनें

अनीला बत्रा

रचनाकार- अनीला बत्रा

विधा- कविता

ज़िन्दगी की उलझने कभी कभी इतना सताती हैं
मुझे अपने बचपन के हसीन लम्हें याद दिलाती हैं।
माँ का आँचल ,पिता का वो प्यार भरा स्पर्श
हर दुःख में मुझे उनकी प्यारी बातें याद आती हैं
आज हर इंसान स्वार्थी ,हर शख्स खुदगर्ज़ है
ईश्वर तुम्हारी दुनिया कितनी मैली नज़र आती है।
मन के भोले लोगों को काँटों से गुज़रना पड़ता है
बुराई यहाँ आज भी फूलों से पूजी जाती है
ज़िन्दगी की उलझने कभी कभी कितना सताती हैं।

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अनीला बत्रा
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'ऐ ज़िन्दगी कुछ ख़ास नहीं हैं चाहतें मेरी, थोड़ी सी मुस्कान लबों पर और थोड़ी सी पहचान दिलों में..' पंजाब के शिक्षा विभाग में सीनीयर सैकेंडरी स्कूल में हिन्दी विषय की अध्यापिका हूँ।पंजाब विश्वविद्यालय से भूगोल विषय में आॅनर्स और एम.ए.(हिन्दी) किया है। भाषा मुझे अत्यन्त प्रिय है और हिन्दी साहित्य में रुचि है।प्रयास करती हूँ कि मेरे कारण किसी के हृदय को ठेस न पहुंचे।

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