ज़िंदग़ी सिगरेट का धुआँ (नवगीत)

ईश्वर दयाल गोस्वामी

रचनाकार- ईश्वर दयाल गोस्वामी

विधा- गीत

ज़िंदग़ी
सिगरेट का धुआँ ।
कहीं खाई,
कहीं कुआँ ।

ज़रदे जैसी
यह ज़हरीली ,
लाल – हरी
और नीली-पीली ।
बढ़ती देख
सदा जलती है ,
जैसे जले रुआँ ।

पहले कश-सी
यह मीठी है ।
कुछ खट्टी और
कुछ तीखी है ।
पक-पक कर
यह गिर जाती है,
ज्यों – टपके
अमुआँ ।

फिल्टर-सी यह
छन जाती है ।
बनते – बनते
बन जाती है ।
बिगड़े तो
भूचाल मचाये,
ज्यों – मचले
मुनुआँ ।

माचिस की
तीली-सी जलती ।
सुख-दुख में यह,
रहती , पलती ।
ज्यों – समाधि
आनंद प्लाविता ,
केन्द्रित हुई
चेतना ।
ज़िंदग़ी
सिगरेट का धुआँ ।

ईश्वर दयाल गोस्वामी
कवि एवम् शिक्षक ।

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ईश्वर दयाल गोस्वामी
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-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02 - 1971 जन्म-स्थान - रहली स्थायी पता- ग्राम पोस्ट-छिरारी,तहसील-. रहली जिला-सागर (मध्य-प्रदेश) पिन-कोड- 470-227 मोवा.नंबर-08463884927 हिन्दीबुंदेली मे गत 25वर्ष से काव्य रचना । कविताएँ समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित । रुचियाँ-काव्य रचना,अभिनय,चित्रकला । पुरस्कार - समकालीन कविता के लिए राज्य शिक्षा केन्द्र भोपाल द्वारा 2013 में राज्य स्तरीय पुरस्कार । नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली द्वारा रमेशदत्त दुबे युवा कवि सम्मान 2015 ।

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