जवाब आ गया माँ !

हरीश लोहुमी

रचनाकार- हरीश लोहुमी

विधा- लघु कथा

जवाब आ गया माँ !
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क्यों कोई जवाब नहीं आ रहा बेटी ? पूरे तीन महीने हो गए तुम्हारे पिताजी को शहर के उस अस्पताल में भर्ती हुए । न जाने कैसा इलाज चल रहा है ! न जाने कैसी तबियत होगी उनकी ! न जाने कैसे रह रहा होगा तुम्हारा भाई अपने बीमार पिताजी के साथ तीमारदार बनकर !

हे भगवान ! कौन है हमारा इस दुनिया में तेरे सिवा ! तू ही कुछ चमत्कार कर ! कुछ तो कुशलक्षेम आये ! कोई तो जवाब आये ! – कहते कहते वह भगवान के चरणों में गिर पड़ी थी ।
तभी दरवाजे पर दस्तक सुनकर उसकी बेटी दरवाजे तक गयी और कुछ देर में वापस आ गयी ।

– जवाब आ गया माँ ! भैया वापस आ रहे हैं पिताजी को लेकर ! हमें अब पिताजी की सेवा करनी है ! दिल से ! जी-जान से !

– भगवान ने तो नहीं दिया माँ ! पर जवाब दे दिया है सारे डाक्टरों ने ! सारे सर्जनों ने !
…… इंतज़ार और भी भारी लगने लगा था ।

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हरीश चन्द्र लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰)
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हरीश लोहुमी
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।

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