जय देवी***

Dinesh Sharma

रचनाकार- Dinesh Sharma

विधा- कविता

देवी के मंदिर सर झुका कर
फल-फूल धुप बत्ती
वस्त्र श्रृंगार चढ़ा कर
भक्ति बखान
दण्डवत् नमन तेरा,
पत्थर की मूर्ति पर अपार श्रद्धा
हैरान भगवान भी
हैरान मैं भी
क्यों की तेरी टेड़ी नजर देखी,
मैंने भी और
उसने भी
मुझ जीती जागती देवी पर,
हैरान भगवान भी
हैरान मैं भी,
हैरान हर वो इंसान भी जो देखता है देवी उस पत्थर में भी
मुझ हाड़-मांस में भी,
मैं भी तो देवी हूँ
जीती जागती
मैं नारी हूँ।

****दिनेश शर्मा****

Views 66
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Dinesh Sharma
Posts 44
Total Views 2.3k
सब रस लेखनी*** जब मन चाहा कुछ लिख देते है, रह जाती है कमियाँ नजरअंदाज करना प्यारे दोस्तों। ऍम कॉम , व्यापार, निवास गंगा के चरणों मे हरिद्वार।।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
One comment
  1. जय देवी***
    नारी का सम्मान ही देवी की सच्ची पूजा है।।