जब तू ही अंजान बन बैठी है

Bhupendra Rawat

रचनाकार- Bhupendra Rawat

विधा- गज़ल/गीतिका

खुदा से शिकायत क्या करूँ
अब तेरी बगावत क्या करूँ

जब तू ही अंजान बन बैठी है
तो अपनो की पहचान क्या करूँ

गुज़ीदा जवहार थी खान का
बता अब तुझ पर गुमांन क्या करूँ
जवाहर(जवाहिर)= रत्न, मणि
गुज़ीदा= चुना हुआ, निर्वाचित

जस्तजूँ में लगे है तुझे चाहने वाले
बता अब मैं तेरी तलाश क्या करूँ

ज़दा है कल्ब नौजवानी की नदानी में
अब तू ही बता ऐतबार क्या करूँ
जदा = चोट खाया
कल्ब = दिल

पयाम है वक़्त का चलते जाना
पाबन्द मैं इस फ़ैज़ का क्या करूँ
पयाम= सन्देश
फ़ैज़= स्वतन्त्रता,

पाकीजा है वाइज़ वो
अब ऐसे खुत्बों का क्या करूँ
पाकीजा=शुद्ध,पवित्र
वाइज़= उपदेश देने वाला
खुत्बों=भाषण

बेगमं भी हूँ, तबहा इंतजार में
तू ही बता खुद को बर्बाद क्या करूँ

इश्क की ड़गर में खुश हूँ
अब नाखुशी का इजहार क्या करूँ

ज़हनुम हो नसीब में जब
अब स्वर्ग का इंतजार क्या करूँ

जब ज़फ़र में भी हार लिखी हो
तो ज़फ़र से प्यार क्या करूँ
ज़फ़र=जीत

ज़ामाना जब बदल गया हो
तू ही बता कल को याद क्या करूँ

ज़मीर जब निलाम हो सरे बाजार में
तो भूपेंद्र की दार का इंतजार क्या करूँ
दार —– फांसी का त्खता

भूपेंद्र रावत
2/09/2018

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Bhupendra Rawat
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M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।

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