जख्म आज भी ताजे हो जाते है

Bhupendra Rawat

रचनाकार- Bhupendra Rawat

विधा- कविता

जख्म आज भी ताजे हो जाते है
जब यादे बनकर वो पल आँखों के
समक्ष आ जाते है
दर्द होता है उस वक्त जब
सारे किस्से फिर वही गीत गाते है
ना भूल पाते है ना ही भुलाए जाते है
वो पल हकीकत बन फिर सताते है
मोती की माफिक पानी बन बाहर आते है
कभी रातों में जुगनुओं से बतियाते है
तो कभी खुद ब खुद ही बडबडाते है
ख़्वाबों में आने का वादा देकर
रतजगा करा जाते है
बंद पिंजरे में हम फडफडा कर रहे जाते है
अपनी यादों की कफ़स में कैद कर जाते है
खुद ही कफ़स से टकराकर घायल हो जाते है
मरहम की जुस्तजूं में जख्म ही पाते है
हम कश्ती को अपनी वही खड़ा पाते है
किनारे का लालच देकर मंझधार में छोड़ जाते है
हक तो जताते नही ख़्वाबों अपना बना जाते है
डूबती हुई नैया को फिजाओं के साहारे ही
आगे बढाते है
खुद पर हँसते है और वो हमे ऐसे ही छोड़ जाते है
जख्म को फिर ताज़ा कर जाते है
ना अपना बताते है और ना ही
यादों से खुद को दूर कर पते है
वो ख़्वाबों में सताते है, रुलाते है, और
हम टूटी हुई माला की तरह बिखर जाते है

भूपेंद्र रावत
12/09/2017

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Bhupendra Rawat
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M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।

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