जंगल …

sushil sarna

रचनाकार- sushil sarna

विधा- अन्य

जंगल …

जंगल के जीव
अब शहरों में चले आये हैं
स्वार्थी इंसान ने
उनके आशियाने
जलाये हैं
बदलते परिवेश में
जानवरों ने तो
अपने मतभेद
मिटा डाले हैं
अफ़सोस लेकिन
इंसान ने
अपने ही खून के रिश्ते
अपने स्वार्थ की
धुंध में
भुला डाले हैं
इंसानी रिश्तों में
बे -इंसान
जंगल बना डाले हैं

सुशील सरना

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sushil sarna
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I,sushil sarna, resident of Jaipur , I am very simple,emotional,transparent and of-course poetry loving person. Passion of poetry., Hamsafar, Paavni,Akshron ke ot se, Shubhastu are my/joint poetry books.Poetry is my passionrn

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