चोरी के दोहे

साहेबलाल 'सरल'

रचनाकार- साहेबलाल 'सरल'

विधा- दोहे

चोरी के दोहे

चोरी की सापेक्षता, स्वारथ करती सिद्ध।
पल में मौसेरा बने, होने को परसिध्द।।

अपने अंतर में अगर, बैठा छिपकर चोर।
लात जोर से मारकर, कर देना कमजोर।।

मानदण्ड सबके अलग, कह दे किसको चोर?
अपने खातिर और है, उसके खातिर और।।

भिन्न भिन्न की भिन्नता, भिन्न भिन्न के चिन्ह।
बना चोर सिरमौर जहाँ, मन हो जाता खिन्न।।

बिना चोर उसको कहे, कैसे पाओ ठौर।
बतलाना ईमान तो, उसको कहना चोर।।

कविता चोरों की बढ़ी, आज बड़ी भरमार।
एक चाहिये ढूँढना, पाओ कई हजार।।

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साहेबलाल 'सरल'
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संक्षेप परिचय *अभिव्यक्ति भावों की" कविता संग्रह का प्रकाशन सन 2011 *'रानी अवंती बाई की वीरगाथा' की आडियो का विभिन्न मंचो में प्रयोग। *'शौचालय बनवा लो' गीत की ऑडियो रिकार्डिंग बेहद चर्चित। *अनेको रचनाएं देश की नामचीन पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। *छंद विधान के कवि के रूप में देश के विभिन्न अखिल भारतीय मंचो पर स्थान। *संपर्क नम्बर-8989800500, 7000432167
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