चोटियों को मापती हैं बेटियाँ अब गगन

manan singh

रचनाकार- manan singh

विधा- गज़ल/गीतिका

2122 2122 212

चोटियों को मापती हैं बेटियाँ
अब गगन बन बोलती हैं बेटियाँ।1

हो रहे रोशन अभी घर देख तो
रूढ़ियों को तोड़तीं है बेटियाँ।2

अब नहीं काँटे चुभेंगे पाँव में
रास्तों को मोड़ती हैं बेटियाँ।3

बाँटते- बँटते जहाँ सब लोग हैं
दो घरों को जोड़ती हैं बेटियाँ।4

फूल की ख्वाहिश पिरोये तू भले
शूल भरदम लोढ़ती हैं बेटियाँ।5

साफ दामन ही रहा तेरा सदा
कालिमा क्यूँ ओढ़ती हैं बेटियाँ?6

बन धरा जो आसमां को ढ़ो रहीं
सोच ले क्या सोचती हैं बेटियाँ।7
@

Views 65
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
manan singh
Posts 13
Total Views 194

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia