चूड़ियाँ जब बजतीं हैं

Abha Saxena

रचनाकार- Abha Saxena

विधा- कविता

चूडियाँ जब बजतीं है

चूडियाँ जब बजतीं हैं बहुत भली ही लगतीं हैं
*माँ की चूड़ियाँ बजती हैं*
माँ की चूड़ियाँ बजती हैं
सुबह सुबह नींद से जगाने के लिये
माँ की चूड़ियाँ बजती हैं
एक एक कौर बना कर मुझे खिलाने के लिये
माँ की चूड़ियाँ बजती हैं
थपकी दे कर मुझे सुलाने के लिये
माँ की चूड़ियाँ बजती हैं
आर्शीवाद और दुआयें देने के लिये……….
हे! ईश्वर सदा मेरी माँ की चूड़ियाँ
इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
ये जब तक बजेंगी खनकेंगी
मेरे पापा का प्यार दुलार
मेरे सिर पर बना रहेगा……
वरना तो मैं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं

*बहन की चूड़ियाँ बजती हैं*

बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरी कमर पर प्यार भरा
धौल जमाने के लिये
बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरे माथे पर चंदन टीका लगाने के लिये
बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरी कलाई पर राखी बाँधने के लिये
बहन की चूड़ियाँ बजती हैं
लड़ने और झगड़ने के लिये
हे! ईश्वर सदा मेरी बहन की चूड़ियाँ
इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
ये जब तक बजेंगी साले बहनोई का
रिश्ता रहेगा
और रहेगा भाई बहन का प्यार जन्मों तक……….

*पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं*
पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
प्रतीक्षारत हाथों से दरवाजा खोलने के लिये
पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
प्यार और मनुहार करने के लिये
पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
हर दिन रसोई में
मेरी पसन्द के तरह तरह के
पकवान बनाने के लिये
पत्नी की चूड़ियाँ बजती हैं
जब वह हो जाती है आलिंगनबद्ध
और सिमट जाती है मेरी बाहुपाश में
हे ईश्वर मेरी पत्नी की चूड़ियाँ
इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
जब तक ये चूड़ियाँ बजेंगी खनकेंगी
तब तक मैं हूं मेरा अस्तित्व है
वरना, इनके बिना मैं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं

*बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं*
बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
पापा पापा करके ससुराल जाते वक्त
मेरी कौली भरते समय
बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
दौड़ती हुयी आये और मेरे
सीने से लगते वक्त
बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
सूनी आँखों में आँसू लिये
मायके से ससुराल जाते वक़्त…….
बेटी की चूड़ियाँ बजती हैं
रूमाल से अपनी आँख के आँसू
पापा से छिपा कर पोंछते वक़्त
हे! ईश्वर मेरी बेटी की चूड़ियाँ
इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
जब तक ये बजेंगी खनकेंगी
मैं उससे दूर रह कर भी
जी सकूंगा……खुश रह सकूंगा

*बहू की चूड़ियाँ बजती हैं*
बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरे घर को अपना बनाने के लिये
बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरे दामन को खुशियों से
भरने के लिये
बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरा वंश आगे बढ़ाने के लिये
बहू की चूड़ियाँ बजती हैं
मेरे बेटे को खुश रखने के लिये
हे! ईश्वर मेरी बहू की चूड़ियाँ
सदा इसी तरह बजती रहें खनकती रहें
जब तक ये बजेंगी खनकेंगी
मेरा बुढ़ापा सार्थक है वरना,
इनके बिना तो मेरा जीना ही
निष्क्रिय है निष्काम है
——————आभा सक्सेना देहरादून

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Abha Saxena
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3 comments
  1. बहुत ही उम्दा लेखन…..नमन आपको…….बहुत ही उम्दा लिखा आप ने……

  2. नारी के प्रत्येक स्वरुप के चूड़ियों की महत्ता के साथ रिश्तो के प्रेम और समर्पण की भावनाओ का चित्रण बहुत बेहतरीन !!