चीख-चीख कह रही धरा

लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

🌹🌹🌹🌹
चीख-चीख कह रही धरा,
मुझको रखो हरा – भरा।

विनाश का बादल मंडरा रहा,
वृक्ष लगाओ ज्यादा से ज्यादा।

सारा वायुमंडल हो रहा है गर्म,
अब तो मानव करो कुछ शर्म।

कुछ तो समझो मानव जरा,
खत्म हो जायेगा अस्तित्व मेरा।

सोच कर बता फिर रहोगे कहाँ,
जब वातावरण ही ना रहेगा यहाँ।

ओजोन परत में हो गया है छेद,
बस कर अब प्रकृति से ना खेल।

प्रकृति को मत कर छिन्न-भिन्न,
मानव अस्तित्व पर लगेगा प्रश्न चिन्ह।

पेड़ों को ऐसे अंधाधुंध कटेगा।
फिर धरा पे तापमान बढ़ जायेगा।

तब तो मैं भी हो जाऊँगी नष्ट,
जन-जीवन हो जायेगा ध्वस्त।

इन्सान होगा कई रोगों से ग्रस्त,
तबाही विनाश से होगें सब त्रस्त।

समय रहते सम्हालो ऐ मानव,
मत बनो खुद अपना ही दानव।

जागरूकता फैलाओ जनजन में,
पेड़ लगाओ हर एक आँगन में।
🌹🌹🌹🌹—लक्ष्मी सिंह 💓☺

Sponsored
Views 139
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
लक्ष्मी सिंह
Posts 255
Total Views 160.2k
MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is a available on major sites like Flipkart, Amazon,24by7 publishing site. Please visit my blog lakshmisingh.blogspot.com( Darpan) This is my collection of poems and stories. Thank you for your support.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia