* चार शेर *

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- शेर

जीना चाहा था मगर
जिंदगी ना मिली ।
मौत भी अब हमसे
अपना दामन छुड़ा के चली ।।

लोग कहते हैं अब भी
मै जिन्दा हूँ मगर
जिंदगी को अलविदा कहे
जमाना गुजर गया ।।

मै कहता रहा जिंदगी से
मुझे रवानी दे दे ।
वरना मुझे मेरी
खोई हुई जवानी दे दे ।।

मेरी मजबूरियों को मेरी
कमजोरियां मत समझज़ालिम
कुछ तो समझ ये तो
मुझे जीने का होंसला देती है ।।

👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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