घिरें काली घटायें जब,मचलने लगता है सावन

Dr Archana Gupta

रचनाकार- Dr Archana Gupta

विधा- गज़ल/गीतिका

घिरें काली घटायें जब,मचलने लगता है सावन
तभी पानी की बूंदे बन,छलकने लगता है सावन

पहन कर देखो हरियाली, खुशी से ये धरा झूमे
खिले फूलों की खुशबू से ,महकने लगता है सावन

पड़ें नीले गगन में जब ,किनारी सात रंगों की
समा ये देख रँगीला ,बहकने लगता है सावन

न सखियाँ झूलतीं झूला, न बाबुल का हँसे अँगना
जमाना देख बदला सा , तड़पने लगता है सावन

पड़ें जब 'अर्चना' रिमझिम ,पवन चलने लगे मधुरिम
सुने जब गीत बारिश के ,चहकने लगता है सावन

डॉ अर्चना गुप्ता
26-07-2017

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Dr Archana Gupta
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Co-Founder and President, Sahityapedia.com जन्मतिथि- 15 जून शिक्षा- एम एस सी (भौतिक शास्त्र), एम एड (गोल्ड मेडलिस्ट), पी एचडी संप्रति- प्रकाशित कृतियाँ- साझा संकलन गीतिकालोक, अधूरा मुक्तक(काव्य संकलन), विहग प्रीति के (साझा मुक्तक संग्रह), काव्योदय (ग़ज़ल संग्रह)प्रथम एवं द्वितीय प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

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