घाव

विनोद कुमार दवे

रचनाकार- विनोद कुमार दवे

विधा- शेर

नाम लिखते है मिटाते है,
अपने ही नाम से अपना दिल बहलाते है,
उसका नाम समाया है मेरे नाम में,
इसी बहाने खुद को उसकी याद दिलाते है।
*** ***
जो घाव लगता है 'दवे' दिल पर, पूरा लगता है,
अब तो ख़ुद का नाम भी अधूरा लगता है

*** ***
हमें देख कर वो नज़र झुका कर गुजर जाती है,
ख़ुदा जाने मुझसे नफरत है या मुझसे शर्माती है।

Sponsored
Views 61
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
विनोद कुमार दवे
Posts 43
Total Views 3.5k
परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। 4 साझा संकलन प्रकाशित एवं 17 साझा संकलन प्रकाशन की प्रक्रिया में। अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत। मोबाइल=9166280718 ईमेल = davevinod14@gmail.com

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia