गैरो मे कहॉ दम है ..अपने ही चोट दे जाते हैं

NIRA Rani

रचनाकार- NIRA Rani

विधा- कविता

क्या हुआ कुछ वक्त के थपेड़ो ने कमजोर कर दिया
टूटा तो वो पहले ही था हालातों ने ढेर कर दिया

गुमा होता है कि जिंदगी मुस्कराएगी
एक बार फिर तरो ताजा हो जाएगी
ताउम्र शायद ये हसरत रह जाएगी ……
कि जिंदगी फिर से मुस्कुराएगी ..

क्यूं कुछ जख्म नासूर बन जाते है
क्यूं कुछ रिश्ते बनते बनते बिगड़ जाते है
इसॉ की शक्ल मे क्यूं भेड़ बन जाते है
खून के रिश्ते ही रिश्तो का खून कर जाते है
गैरो मे कहॉ दम है अपने ही चोट दे जाते है

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NIRA Rani
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साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..

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