गीत

kalipad prasad

रचनाकार- kalipad prasad

विधा- गीत

मिटटी से मेरा जनम हुआ, मिटटी में मिल जाता हूँ
छोटी सी है जिंदगी मगर, जगत को जगमगाता हूँ |

दीवाली हो या होली हो, प्रात:काल या सबेरा
जब भी जलाया मुझे तुमने, किया दूर सब अन्धेरा |
जलना ही मेरी नियति बनी, जलकर प्रकाश देता हूँ
मिटटी से मेरा जनम हुआ, मिटटी में मिल जाता हूँ
छोटी सी है जिंदगी मगर, जगत को जगमगाता हूँ |

धनी गरीब या राजा रंक, सबका ही मै हूँ प्यारा
मेरी रौशनी तामस हरती, मानते हैं जगत सारा
भेद भाव नहीं करता कभी, सबके घर मैं जाता हूँ
मिटटी से मेरा जनम हुआ, मिटटी में मिल जाता हूँ
छोटी सी है जिंदगी मगर, जगत को जगमगाता हूँ |

मिले तुम्हे प्यार सम्मान सब, ख़ुशी ख़ुशी मुझे जलाना
भूलकर डाह दुःख दर्द तुम, जीवन में खुशियाँ लाना
जलती बाती ज्ञान-प्रीत की, लेकर यश मैं जाता हूँ
मिटटी से मेरा जनम हुआ, मिटटी में मिल जाता हूँ
छोटी सी है जिंदगी मगर, जगत को जगमगाता हूँ |

© कालीपद ‘प्रसाद’

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kalipad prasad
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स्वांत सुखाय लिख्ता हूँ |दिल के आकाश में जब भाव, भावना, विचारों के बादल गरजने लगते हैं तो कागज पर तुकांत, अतुकांत कविता ,दोहे , ग़ज़ल , मुक्तक , हाइकू, तांका, लघु कथा, कहानी और कभी कभी उपन्यास के रूप में उतर जाते हैं | कवितायेँ कहानियाँ समाचार पत्रिका में प्रकाशित होती रहती है | दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुकी है |

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