गीत – प्रथम मिलन

मनोज मानव

रचनाकार- मनोज मानव

विधा- गीत

क्या होता उस रात सखी सुन , सब बतलाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

अरमानों की सजी सेज पर
बैठी थी सजकर
पिया खोल दरवाजा चुपके
आये फिर अंदर
कुण्डी करके बन्द सजन फिर
हल्का मुस्काये
अगले पल की सोच सोच कर
कांपी मैं थर थर
आकर मेरे पास पिया ने , हाथ छुआ मेरा
छूई' मुई सी तब खुद को मैं, सिकुड़ी पाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

धीरे धीरे घूँघट मेरा ,
ऊपर सरकाया
पूनम का फिर चाँद गगन से
धरती पर आया
साजन को मुझमें सपनों की ,
परी नजर आई
मैंने भी देखे सपनों को
सच होते पाया
एक अंगूठी मुँह दिखलाई , मुझको पहनाई
मन ही मन नजराना पाकर , मैं हर्षाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

पिया मिलन की घड़ी आ गयी
दिल था घबराया
मीठी मीठी बातों से फिर
मुझको बहलाया
बड़े प्यार से माली ने जो
कली खिलाई थी
उसी कली को फूल बनाने
भँवरा मंडराया
तन से तन का हुआ मिलन तो , एक रस्म पगली
मन से मन के हुए मिलन के , लाभ गिनाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

मन मिलने पर स्वर्ग धरा पर
दिखने लगता है
दूजे का सुख दुख अपना ही
लगने लगता है
तना मूल से सब वृक्षो का
जुड़ा हुआ जैसे
मानव मानव से ऐसे ही
जुड़ने लगता है
हो जाते है ए'क दूजे के , जीवन भर को हम
ऐसी पावन संस्कृति को मैं , शीश झुकाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

मनोज मानव

क्या होता उस रात सखी सुन , सब बतलाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

अरमानों की सजी सेज पर
बैठी थी सजकर
पिया खोल दरवाजा चुपके
आये फिर अंदर
कुण्डी करके बन्द सजन फिर
हल्का मुस्काये
अगले पल की सोच सोच कर
कांपी मैं थर थर
आकर मेरे पास पिया ने , हाथ छुआ मेरा
छूई' मुई सी तब खुद को मैं, सिकुड़ी पाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

धीरे धीरे घूँघट मेरा ,
ऊपर सरकाया
पूनम का फिर चाँद गगन से
धरती पर आया
साजन को मुझमें सपनों की ,
परी नजर आई
मैंने भी देखे सपनों को
सच होते पाया
एक अंगूठी मुँह दिखलाई , मुझको पहनाई
मन ही मन नजराना पाकर , मैं हर्षाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

पिया मिलन की घड़ी आ गयी
दिल था घबराया
मीठी मीठी बातों से फिर
मुझको बहलाया
बड़े प्यार से माली ने जो
कली खिलाई थी
उसी कली को फूल बनाने
भँवरा मंडराया
तन से तन का हुआ मिलन तो , एक रस्म पगली
मन से मन के हुए मिलन के , लाभ गिनाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

मन मिलने पर स्वर्ग धरा पर
दिखने लगता है
दूजे का सुख दुख अपना ही
लगने लगता है
तना मूल से सब वृक्षो का
जुड़ा हुआ जैसे
मानव मानव से ऐसे ही
जुड़ने लगता है
हो जाते है ए'क दूजे के , जीवन भर को हम
ऐसी पावन संस्कृति को मैं , शीश झुकाती हूँ
प्रथम मिलन की तुझको सारी , कथा सुनाती हूँ

मनोज मानव

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2 comments
  1. वाह्ह्ह् वाह्ह्ह्हज लाजवाब रचना मनोज मानव जी । स्वागत आपका ।