गीत : तुम क्या जानो दुख पायल का ?

डॉ. हीरालाल प्रजापति

रचनाकार- डॉ. हीरालाल प्रजापति

विधा- गीत

तुम क्या जानो दुख पायल का ,
तुमको तो छन – छन से मतलब ?
चूड़ी कितनी चिटके – टूटे ,
तुमको बस खन – खन से मतलब ?
तुमको बस अच्छे लगते वो
मेंढक जो टर्राते हैं सच ।
गाने वालों से ज़्यादा प्रिय
तुमको जो चिल्लाते हैं सच ।
तुमको कोयल की कूकें ,
बुलबुल के नग्में कब जँचते रे ?
टकराहट से निकले कर्कश –
स्वर ही तुमको भाते हैं सच ।
तुम क्या समझो ठुकती कीलों
के माथे की पीड़ा को हाँ ?
कितनी चोटें सहता घण्टा ?
तुमको बस टन – टन से मतलब ॥
चूड़ी कितनी चिटके – टूटे ,
तुमको बस खन – खन से मतलब ?
हर पल चौकन्ना रहता
बचता फिरता निश – भोर पवन से ।
कठिनाई से ख़ुद को रखता
दीप्त घिरा चहुंओर पवन से ।
वह उस पाटल की पंखुड़ियों सा
कोमल जो झड़ जाता रे ,
अश्वचलन से चलने वाली
अंधड़ सी घनघोर पवन से ।
तुमको साँय – साँय जो प्यारी
वो दीपक को हाहाकारी ,
तुम क्या जानो उसके भय को ?
तुमको बस सन – सन से मतलब ॥
चूड़ी कितनी चिटके – टूटे ,
तुमको बस खन – खन से मतलब ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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