गीतिका

Rishav Tomar (Radhe)

रचनाकार- Rishav Tomar (Radhe)

विधा- गज़ल/गीतिका

प्यार मेरा एक नदी था,वो बूँद हो गया
मैं खुशियों का ताज था खण्डर हो गया

सब कुछ बड़ा सा, मैं चाहते चाहते हुये
दो हजार के नोट से छुटा पैसा हो गया

चिन्ता,फिक्र,परेसानी,जिमेदारी कुछ भी नही
लेकिन आज हम भी इनके कारोबारी हो गये

बिल्कुल फूलों जैसा किरदार था जीवन में
लेकिन आज मैं काँटो की सवारी हो गया

कल कुंभकर्ण की तरह हमेशा बेफिक्र सोता था
लेकिन चाहत में मीरा की तरह साधक हो गया

कल दिन रात दोस्तो की मदद करता था मैं
लेकिन आज वक्त के हाथों खुद गिरवी हो गया

प्रेम मोहबत तसली से रहता था अपने घर मे
तेरे जाने पर सूखती नदी की मछली हो गया

थी हवाये मुस्कुराती सी ऋषभ ,और गाती धूप
मगर प्रदूषण का इन सब पर पहरा हो गया

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Rishav Tomar (Radhe)
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ऋषभ तोमर पी .जी.कॉलेज अम्बाह मुरैना बी.एससी.चतुर्थ सेमेस्टर(गणित)

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