** गीतिका **

पूनम झा

रचनाकार- पूनम झा

विधा- गज़ल/गीतिका

जिंदगी लगती कभी सीधी तो,कभी आरी है।
पूरी जिन्दगी इस गुत्थी को समझना भारी है।
*
डुबकी लगाना ही पड़ता है इस ऊहापोह में,
साथ हमारे रहता हमेशा वक्त की सवारी है।
*
कभी दर्द को दफन करके है हँसना पड़ता,
तो कभी बेमतलब ही हँसना रहता जारी है।
*
वक्त जाया कर लेते हैं हम इसे समझने में ,
चलते चलें ये सवारी न हमारी है न तुम्हारी है।
*
कहे पूनम उलझे रहते हम इसे सुलझाने में,
यही गुत्थी कहाती जिंदगी की जिम्मेदारी है।
@पूनम झा
कोटा राजस्थान

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पूनम झा
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मैं पूनम झा कोटा,राजस्थान (जन्मस्थान: मधुबनी,बिहार) से । सामने दिखती हुई सच्चाई के प्रति मेरे मन में जो भाव आते हैं उसे शब्दों में पिरोती हूँ और यही शब्दों की माला रचना के कई रूपों में उभर कर आती है। मैं ब्लॉग भी लिखती हूँ | इसका श्रेय मेरी प्यारी बेटी को जाता है । उसी ने मुझे ब्लॉग लिखने को उत्प्रेरित किया। कभी कभी पत्रिकाओं में मेरी रचना प्रकाशित होती रहती है | ब्लॉग- mannkibhasha.blogspot.com

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