गिरगिट

अनिल कुमार मिश्र

रचनाकार- अनिल कुमार मिश्र

विधा- कविता

इस रंगीन जगत से गिरगिट
तुम बाहर आ जाओ आज
रंग बदलना बंद करो अब
धोती-कुरता धारो आज।

रंग बदलना तेरा प्रतिपल
मानव को बहकाता है
वस्त्रहीन होकर अब मानव
झट बेरंग हो जाता है।

कभी लाल पीला वह होता
हरा कभी हो जाता है
मन उसका नीला हो जाता
जहरीला हो जाता है।

नंगा गिरगिट,मानव नंगा
नंगेपन की दौड़ लगी है
नंगेपन में रंग बदलना
मानवता अब सीख रही है।

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अनिल कुमार मिश्र
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अनिल कुमार मिश्र विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित काव्य संकलन'अब दिल्ली में डर लगता है'(अमेज़न,फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध) अशोक अंचल स्मृति सम्मान 2010 लगभग 20 वर्षों से शिक्षण एवं प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन सम्प्रति प्राचार्य,सी बी एस ई स्कूल निरंतर मुक्त लेखन आपके स्नेह का पात्र संपर्क-9576729809 itsanil76@gmail.com

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