गांव तरसते हैं…

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

रचनाकार- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

विधा- गीत

सुविधाओं के लिए अभी भी गांव तरसते हैं।
सब कहते इस लोकतन्‍त्र में
शासन तेरा है,
फिर भी ‘होरी’ की कुटिया में
घना अंधेरा है,
अभी उजाले महाजनों के घर में बसते हैं।

अभी व्‍यवस्‍था
दुःशासन को पाले पोसे है,
अभी द्रौपदी की लज्‍जा
भगवान – भरोसे है,
अपमानों के दंश अभी सीता को डसते हैं।

फसल मुनाफाखोर खा गये
केवल कर्ज बचा,
श्रम में घुलती गयी जिन्‍दगी
बढ़ता मर्ज बचा,
कृषक सूद के इन्‍द्रजाल में अब भी फँसते हैं।

रोजी – रोटी की खातिर
वह अब तक आकुल है,
युवा बहिन का मन
घर की हालत से व्‍याकुल है,
वृद्ध पिता माता के रह रह नेत्र बरसते हैं।

— त्रिलोक सिंह ठकुरेला

Views 11
इस पेज का लिंक-
Sponsored
Recommended
Author
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
Posts 10
Total Views 315
त्रिलोक सिंह ठकुरेला कुण्डलिया छंद के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं.कुण्डलिया छंद को नये आयाम देने में इनका अप्रतिम योगदान है.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia