“गरमी की दुपहरी”

Prashant Sharma

रचनाकार- Prashant Sharma

विधा- कुण्डलिया

गरमी की ये दुपहरी,बनी आग का ताज़।
किरणों से तपती धरा,कैसे होवे काज।
कैसे होवे काज,पसीना तन पर आये।
राह दिखें सब शांत,ह्रदय को कुछ ना भाये।।
कह प्रशांत कविराय,आयगी कब तक नरमी।
नाहक उगले आग,दुपहरी की ये गरमी।

प्रशांत शर्मा "सरल"
नेहरू वार्ड नरसिंहपुर
मोबाइल 9009594797
:

Views 25
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Prashant Sharma
Posts 29
Total Views 1.1k

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia