** गजल **

पूनम झा

रचनाकार- पूनम झा

विधा- गज़ल/गीतिका

कहते थे अपना पर, कहो क्यूं अब मैं बेगानी हो गई।
जो कसमें खायी थी तुमने, वो सारी बेमानी हो गई ।
*
बड़ी सिद्दत से निभायी है , जिस रिश्ते को हमने
आज तो लगता यही है जैसे मेरी ही कुर्बानी हो गई।
*
बेवजह अपने दिल पर किया हमने जुल्मों सितम
चोट खाए जख्म हरे हैं,कैसे कहूं बातें पुरानी हो गई।
*
सोचा दर्द दिल की, एक कहानी ही लिख दूँ पर
जिनको लिखना था वो सब बातें जुबानी हो गई ।
*
जिंदगी के सफर में कई मोड़ से गुजरी है " पूनम "
आह निकलती है दिल से कैसे कहूं मेहरबानी हो गई।
@पूनम झा
कोटा राजस्थान

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पूनम झा
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मैं पूनम झा कोटा,राजस्थान (जन्मस्थान: मधुबनी,बिहार) से । सामने दिखती हुई सच्चाई के प्रति मेरे मन में जो भाव आते हैं उसे शब्दों में पिरोती हूँ और यही शब्दों की माला रचना के कई रूपों में उभर कर आती है। मैं ब्लॉग भी लिखती हूँ | इसका श्रेय मेरी प्यारी बेटी को जाता है । उसी ने मुझे ब्लॉग लिखने को उत्प्रेरित किया। कभी कभी पत्रिकाओं में मेरी रचना प्रकाशित होती रहती है | ब्लॉग- mannkibhasha.blogspot.com
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