गजल

Vandaana Goyal

रचनाकार- Vandaana Goyal

विधा- गज़ल/गीतिका

बहर १२२२ १२२२ १२२२ १२२२
काफिया ई
रदीफ मालूम होती है
गजल
नदी बरसो यहॉ कोई बही मालूम होती है
सुनी थी जो कहानी, अब सही मालूम होती है

है जिंदा खुशबुएँ अब तलक दीवारो मे महलो की
मिरी जॉ ,वो यहॉ सदियो रही मालूम होती है

बिठा लाकर कभी उसको भी पहलू मे खुशबुऔ की
ये रंजो गम की दीवारे ढही मालूम होती है

कहा किसने, दिलो को तोड तू ,छिपके चली जा अब
जहॉ देखूँ वही मुझको खडी मालूम होती है

पली नाजो,हँसी रातो,खिली फूलो सी वो बेटी
मुझे तो कोई खुबसूरत परी मालूम होती है

गिरा अश्कों को यों ना वंदना पलको से रातोदिन
हँसी अनमोल मोती की लडी मालूम होती है
वंदना मोदी गोयल

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Vandaana Goyal
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बंदना मोदी गोयल प्रकाशित उपन्यास हिमखंड छठा पूत सांझा काव्य संग्रह,कथा संग्रह राष्टीय पञ पत्रिकाओं में कविता कथा कहानी लेखों प्रकाशन मंच पर काव्य प्रस्तुति निवास फरीदाबाद

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