गजल : हिना रंग लाती है सूख जाने के बाद

Radhey shyam Pritam

रचनाकार- Radhey shyam Pritam

विधा- गज़ल/गीतिका

सोना जेवर बनता अग्नि में तप जाने के बाद।
इंसान संभलता जिंदगी में ठोकर खाने के बाद।।

हथेली पर सरसों कब हरी होती है मेरे दोस्त।
हिना भी रंग बिखराती है सूख जाने के बाद।।

मुझे कभी दर्द का अहसास ही नहीं हुआ था।
बहुत रोया पर जुदाई में तेरे दूर जाने के बाद।।

कभी न समझा मैं धोखेबाजी का रंज क्या है।
आज समझा हूँ अपनों से सजा पाने के बाद।।

बगल में छूरी मुँह में राम-राम सुना जिसके भी।
वही हँसता-सा लगा है घर जल जाने के बाद।।

इस अविश्वास भरे दौर में विश्वास खोजने चला।
विश्वास ही काम आया दोस्त !बुलाने के बाद।।

"प्रीतम" हिम्मत की दाद तो सभी देते हैं यहाँ।
कोई हौसला दे कभी कदम लडखडाने के बाद।।

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Radhey shyam Pritam
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