💝💝◆जिन्दगी◆💝💝

Radhey shyam Pritam

रचनाकार- Radhey shyam Pritam

विधा- कविता

कभी खुशनुमा कभी उदास लगती है जिन्दगी।
हरपल एक नया इतिहास लगती है जिन्दगी।।

झाँक कर देखा जब भी इंसान की आँखों में।
लिए बैठे वर्षों की प्यास लगती है जिन्दगी।।

कल उडाकर ले गई मकानों की छतें आँधियाँ।
फूली-फूली-सी सबकी साँस लगती है जिंदगी।।

शेर की खाल पहने सियार से सब डर गए।
दहशत में फँसी,उलझी दास लगती है जिंदगी।।

तेरे चेहरे को देखकर में तमाम गम भूल गया।
कसम से आज बडी बिंदास लगती है जिंदगी।।

घृणा,द्वेष,वैमनस्य की आग में शहर झुलसा है।
हर तरफ मौत का आभास लगती है जिंदगी।।

जिसको भी देखो वही भटकता है अनजान-सा।
कभी न खत्म हो वो तलास लगती है जिंदगी।।

लक्ष्य न कोई सफर का ही पता है हमें यारा।
कटी पतंग-सा एक विश्वास लगती है जिंदगी।।

आज मजे में गुजरे कल कौन देखे की सोच।
स्वार्थ का ये कोरा अहसास लगती है जिन्दगी।।

कयों सिर पकडकर बैठ गया"प्रीतम"आज तू।
क्या गम से घिरी बकवास लगती है जिंदगी।।
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राधेयश्याम….बंगालिया….प्रीतम….कृत

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Radhey shyam Pritam
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