खेलती है चिन्गारियां

Sonika Mishra

रचनाकार- Sonika Mishra

विधा- कविता

खेलती है चिन्गारियां
बेबस आग के लिए
है मजदूर लहू बहाता
कठपुतली से बैठे
साहूकार के लिए
दीर्घ चोटी पर
है लहराता ध्वजा
मिट जाती है नींव
स्वाभिमान के लिए
कितनी सांसे जी ली
न जाने कितनी बाकी है
कौन आता है यहाँ
हिसाब के लिए
मेरा मकसद नहीं
शीर्ष पर पहुंचना
मैं आयी हूं इस जहां में
धूल से लिपटे हाथों के
कीर्तिमान के लिए

-सोनिका मिश्रा

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Sonika Mishra
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मेरे शब्द एक प्रहार हैं, न कोई जीत न कोई हार हैं | डूब गए तो सागर है, तैर लिया तो इतिहास हैं ||
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