खुली बटनें !

Satyendra kumar Upadhyay

रचनाकार- Satyendra kumar Upadhyay

विधा- कहानी

पिताजी आपकी बटन खुली है ! बंद कर लीजिए ना ! तभी कड़कदार आवाज में उन्होंने कहा कि "चुप रहो ! बच्चे हो !" यह सुन ! वह शांत तो हो गया था , पर उसे अपने टीचर की बात याद आ रही थी ; जिसने उसे पूरे आधे घंटे मुर्गा बना के रखा था ! चूॅकि उसकी थर्ड बटन जो टूट गयी थी और वह माॅ से कहने के बावजूद, अनुपलब्धता के कारण पनिशमेंट खा गया था , वह भी अपने साथी व प्रिय संगतिनियों के सामने !
आज लगभग ढेड़ सौ किमी की यात्रा तय कर, इसी बच्चे "रवि" की एक बेहद अहम पद पर ताजपोशी थी और उसमें आने-वाले आगंतुकों की भीड़ में यह इक नन्हा सा बच्चा भी आया था और संयोग से "रवि" के उसे गले लगाते ही वह बोल बैठा था कि " अंकल ! आप अब सक्षम तो हो गये हैं ना ! तो क्या ? मैं कुछ बोलूॅ ? "
यह सुन "रवि" ने बालसुलभ स्वभाव की बात रख "हाॅ " करी ही थी ! कि उसने अपने ही पिताजी के , "अंग-वस्त्रों" की ओर मूक इशारा भर ही किया था ! लेकिन "रवि" कुछ समझ नहीं पाया ! तो उस बच्चे ने पुनः कहा बटन देखिए ! कितनी खुली हैं ? तो रवि ने ध्यान दिया ! तो पाॅच में सिर्फ एक ही बंद थी !
और कुछ सफेद व कुछेक सुनहरी जंजीर जो कि जंजीर नहीं ; बल्कि जंजीरा बन उनके गले से लटक रहीं थीं ! वह भी उसके अभिवादन के दरम्यान ही ; बटनों को ऑखें दिखाती बाहर जरूर आ गयी थीं ; शायद खुद को अतिउत्तम दिखाने को बेहद आतुर थीं !
रवि ! जो कि अपनी सभी बटने बंद किये ; महज अपनी ताजपोशी में मशगूल था ! उसे यह सुन ! अपना बचपना याद आ गया ! और उसने उस बच्चे से धीरे से कहा कि "मैं भी महज दाॅत पीसता रह गया हूॅ और ये इस स्थिति में आने तक बेहद पिस कर घिस चुके हैं, आज की मेरी इन दिखावा भरी मुस्कराहटों के पीछे !"
पर अब देखना ! उस गुरू जी की कसम ! कि ये मेहनत से लगायी बटनें कभी खुली नहीं रहेंगी ।
तभी उसके पिताजी ने आवाज दी कि "बेटा ! चलो ढेड़ सौ किमी दूर अभी जाना है !"
यह सुन वह "रवि" की गोद से उछल जा गिरा था ; अपने पिताजी की उन्हीं खुली बटनों के बीच ! जहाँ उसका बचपन और भविष्य समाया था । लेकिन वह नन्हा सा बच्चा ! बहुत कुछ कह गया था "रवि" से ! वह भी उसे बचपन की याद दिलाते हुए !!!

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Satyendra kumar Upadhyay
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