“खुबसीरत” सी बेटियाँ” :)

इंदु वर्मा

रचनाकार- इंदु वर्मा

विधा- कविता

कितना आसान है न….
गैरों की बेटियों का वजूद तय कर जाना …
नज़रिए के तराजू को अपमान से भरकर…
उसके तन और मन को एक साथ तोल जाना

अपने मन की कालिक से
उसके सावले से रंग को काला स्याह कर जाना…
ओछी सी सोच से उसके कद को कभी छोटा कभी बड़ा
और वजन को कम ज्यादा कर जाना..
कितना आसान है न..

हौसले से भरी चाल चले तो चाल चलन का अंदाज़ा लगाना …
अगर खामोश चुप सी रहे तो "गूंगी गवांर"का ताना कस जाना…
दुपट्टे की लहराहट औऱ जीन्स की कसावट से
उसके संस्कारों का हिसाब लिख जाना
कितना आसान है न..

जाने किस पैमाने पर नापते है लोग …
बाजार की गुड़िया और आँगन की बिटिया में फ़र्क क्यूँ नही समझ पाते हैं लोग…..
क्यूँ नही समझ पाते बेटियाँ सब की एक जैसी ही होती हैं किसी की "खूबसूरत" भी
होती हैं…
किसी की सिर्फ़ "खूबसीरत"ही होती हैं……

© "इंदु रिंकी वर्मा"

Sponsored
Views 304
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
इंदु वर्मा
Posts 15
Total Views 978
मैं "इंदु वर्मा" राजस्थान की निवासी हूं,कोई बहुत बड़ी लेखिका या कवयित्री नहीं हूं लेकिन हाँ लिखना अच्छा लगता है सामाजिक विषयों और परिस्थितियों पर मन और कलम का गठबंधन करके ☺ कोई किताब या पत्रिका भी नहीं छपी पर हां सोशल साइट पर बड़ी संख्या में कॉपी पेस्ट और उन पर सकारात्मक और भावनात्मक टिप्पणियों और दोस्तों के द्वारा उत्साहवर्धन से लगा "हां मैं भी लिख सकती हूं"😝 और लिखूंगी ☺

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia