खुद फूंक रहे हैं

guru saxena

रचनाकार- guru saxena

विधा- घनाक्षरी

खुद फूंक रहे हैं
घनाक्षरी छंद
काट काट रेल की पटरियां उखाड़ रहे,
स्टेशन मिटाने में नहीं चूक रहे हैं।
आफिसों में तोड़फोड़ सभी शीशे रहे फोड़,
नजर उठाए जो भी उसे हूंक रहे हैं।
बसों में लगा रहे हैं आग दौड़ दौड़कर,
कई निरदोष आँच में ही सूख रहे हैं।
भारत के दुश्मनों तुम कुछ भी न करो,
हम तो हमारा देश खुद फूंक रहे हैं।

गुरु सक्सेना नरसिंहपुर मध्य प्रदेश

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