खुद्दारी

विनोद कुमार दवे

रचनाकार- विनोद कुमार दवे

विधा- कविता

चुप रहकर भले ही तुमन सत्ता से यारी रखते हो,
लेकिन अपने दिल से पूछो,क्या खुद्दारी रखते हो।

जफ़ा ये सहकर तुमने शायद कोई खजाना पाया है,
शायद इन जंजीरो में तुम्हें सुख चैन नज़र आया है,
लेकिन इन सोने चांदी के पिंजरों से बाहर आकर देखो,
खुले हुए अम्बर के तले अपने अपने पर फैलाकर देखो,

परवाज तुम्हारी भारी है क्यों लाचारी रखते हो,
खुद के तुम ही ख़ुदा हो यारो तुम खुद्दारी रखते हो।

बेहतरीन साहित्यिक पुस्तकें सिर्फ आपके लिए- यहाँ क्लिक करें

Views 166
इस पेज का लिंक-
Sponsored
Recommended
Author
विनोद कुमार दवे
Posts 43
Total Views 3.3k
परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत। मोबाइल=9166280718 ईमेल = davevinod14@gmail.com

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia