ख़यालों में उनके उलझने लगे हैं

अजय कुमार मिश्र

रचनाकार- अजय कुमार मिश्र

विधा- गज़ल/गीतिका

नज़र ये मिली है उनसे ही जबसे
हसरतें तो दिल के सँवरने लगे हैं।
दिल में मेरे तो अब उमंगें जगी हैं
साज तो दिल के भी बज़ने लगे है।
कैसे अब पहुँचे उन तक संदेशा
जज़्बात दिल के पिघलने लगे हैं।
बात कोई भी ज़ेहन में न आती
ख़यालों में उनके उलझने लगे हैं।
काम अब मेरा कोई भी नहीं है
रातों में तारे अब गिनने लगे हैं।
यात्रा कोई भी अब पूरी न होती
पग पग पर हम ठिठकने लगे हैं।
उनकी नज़र से तो ऐसे हैं उलझे
सँवरते सँवरते ही बिखरने लगे हैं।
नजर का हुआ तो ऐसा असर है
चाहत की हद से गुज़रने लगे है।
उनसे तो कोई मिला दे मुझको
साँसे अब मेरे तो थमने लगे हैं

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अजय कुमार मिश्र
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रचना क्षेत्र में मेरा पदार्पण अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को निखारने के उद्देश्य से हुआ। लेकिन एक लेखक का जुड़ाव जब तक पाठकों से नहीं होगा , तब तक रचना अर्थवान नहीं हो सकती।यहीं से मेरा रचना क्रम स्वयं से संवाद से परिवर्तित होकर सामाजिक संवाद का रूप धारण कर लिया है। कविता , शेर , ग़ज़ल , कहानियाँ , लेख लिखता रहा हूँ।

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