खण्ड खण्ड कर दिया भारत को, अखण्ड भारत तो ख्वाब रहा

अरविन्द दाँगी

रचनाकार- अरविन्द दाँगी "विकल"

विधा- कविता

मेरे साहित्य जीवन की प्रथम भारत कविता
————————————————
खण्ड खण्ड कर दिया भारत को, अखण्ड भारत तो ख्वाब रहा

1
खण्ड – खण्ड कर दिया भारत को, अखण्ड भारत तो ख्वाब रहा,
टुकड़े – टुकड़े कर डाले हें, अब रोटी मे वो स्वाद कहाँ,
हर दिल को तोड़ा हे हमने, अब वो निश्छल प्यार कहाँ,
रो रही बुलबुल पेड़ो पर, अब कोयल की कुह कहाँ,
खण्ड-खण्ड कर दिया भारत को, अखण्ड भारत तो ख्वाब रहा ।।
2
हमने तोड़े मंदिर-मस्जिद, अब क्यो ढूंढे शांत जगह,
मानव को मानव से लड़वाया, अब दिलो मे प्यार कहाँ,
छोड़ दी हमने मानवता, इंसान के रूप मे भगवान कहाँ,
क्रोध – क्रूरता भरी हे मन मे, फिर शांति संतोष कहाँ,
खण्ड-खण्ड कर दिया भारत को, अखण्ड भारत तो ख्वाब रहा ।।
3
लूट का व्यापार बढ़ा हे, सदाचार का वक्त कहाँ,
दिलो मे केवल बैर भरा हे, जीवन की मधुता हे कहाँ,
राजनीति मे घुस भरी हे, रह गया प्रजाहित कहाँ,
वर्दी वाले बने दुराचारी, शोषित पाये न्याय कहाँ,
खण्ड-खण्ड कर दिया भारत को, अखण्ड भारत तो ख्वाब रहा ।।
4
आतंक की लम्बी मिसाल हे, अब शांति की बयार कहाँ,
भय मे डुबे और सहमे हे, चेहरो पर वो मुस्कान कहाँ,
जीवन से प्यारी मौत मानली, अब जीवन से प्यार कहाँ,
अपराधी हुये ओर बुलंद हे, उनके मन मे खौफ कहाँ,
खण्ड-खण्ड कर दिया भारत को, अखण्ड भारत तो ख्वाब रहा ।।
5
जीवन मे फ़ैली लाचरी, जीने की उम्मीद कहाँ,
आजादी के संग गुलामी, स्वतंत्र भारत का ख्वाब कहाँ,
चहू और फ़ैली बरबादी, मानवता का नाम कहाँ
सेवा हो रही उधर कसाब की, हरिश्चंद्र जैसा न्याय कहाँ,
खण्ड-खण्ड कर दिया भारत को,अखण्ड भारत तो ख्वाब रहा ।।

✍कुछ पंक्तियाँ मेरी कलम से : अरविन्द दाँगी "विकल"

Views 131
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
अरविन्द दाँगी
Posts 24
Total Views 416
जो बात हो दिल की वो कलम से कहता हूँ.... गर हो कोई ख़ामोशी...वो कलम से कहता हूँ... ✍अरविन्द दाँगी "विकल"

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia