क्षुधा

Bikash Baruah

रचनाकार- Bikash Baruah

विधा- लघु कथा

रात का वक्त,रास्ता एकदम सुनसान था। आकाश को छूती स्ट्रीट लाइटें अपने-अपने कर्म
में व्यस्त थी। दूर गगन में तारे टिमटिमा रहे थे और चांद अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था।
छोटी-बड़ी गाड़ियाँ तेज गति से धूल उड़ाती हुई सड़क से गुजर रही थी।

इस बीच एक कुत्ता मुँह में रोटी का एक टुकड़ा लिए सड़क के बीचोंबीच दौड़ता हुआ जा रहा था। उसके पीछे-पीछे एक और कुत्ता ऐसे दौड़ रहा था जैसे चोर के पीछे पुलिस दौड़ रही हो। शायद दोनों ही बहुत भूखे थे ।
दोनों उस रोटी के टुकड़े को छीनने के लिए एक दूसरे के ऊपर झपट पड़े। कोई किसीको
रोटी आसानी से देने के लिए तैयार नहीं। शायद इसीलिए अपनी जिंदगी की आखिरी बाजी समझकर वह दोनों एक दूसरे के खिलाफ
घमासान युद्ध कर रहे थे। यह युद्ध न्याय-अन्याय का नहीं था,ना ही कोई पाप-पुण्य का था; यह युद्ध भूख का था और जो आदमी हो या जानवर सबके लिए हरेक दौड़ में हरेक
युग में एक बड़ा विषय रहा है और शायद आगे भी रहेगा ।

दोनों कुत्ते लड़ाई कर रहे थे। तभी एक भिखारी अचानक कहीं से आकर वहाँ इस तरह खड़ा हो गया,जैसे कोई देवता अपने भक्तों को
दर्शन देने हेतु प्रकट होता है। परंतु देवता और उस भिखारी में जमीन-आसमान का अन्तर था।
क्योंकि वह भिखारी देवता की तरह सुसज्जित नहीं था। पहनावे में गंदे फटी हुई कमीज और
धोती,गले में लटकती हुई कुछ रस्सियाँ, कन्धे
पर प्लास्टिक का झोला और हाथ में उसके अस्त्र या बुढ़ापे का सहारे सदृश एक लाठी थी।
वह भिखारी दोनों कुत्तों को रोटी के टुकड़े के लिए लड़ाई करता हुआ देख रहा था। शायद वह भी दोनों कुत्तों की तरह कई दिनों का भूखा था। इसलिए वह अपनी मानवीय अस्तित्व को भुलाकर जानवर की तरह उन दो कुत्तों के
बीच रोटी के टुकड़े को छीनने के लिए चल रहे युद्ध के बीच कूद पड़ा। पर कुत्ते आसानी से मैदान छोड़ नहीं रहे थे,क्योंकि उन्हें भूख की तड़प थी। भिखारी भी लाठी से जी तोड़ कोशिश कर रहा था कुत्तों से रोटी के टुकड़े को छीनने के लिए ताकि वह अपनी भूख मिटा सके ।
तीनों के बीच भीषण युद्ध चल रहा था, जैसे कुरूक्षेत्र में कौरव और पांडव के बीच युद्ध हुआ था। अचानक एक तेज गति से आ रही गाड़ी उन दो कुत्तों को कुचल कर चली गई ।
भिखारी बच गया। वह रोटी के टुकड़े को उठाने गया, लेकिन कुत्तों के ताजे खुन से रोटी का रंग लाल हो चुका था। भिखारी रोटी को हाथ में लेकर एक बार आसमान की ओर तो एक बार पास पड़ी हुई कुत्तों की लाश की
तरफ देखता रहा। अंत में एक विकट् चीत्कार
कर भिखारी ज़मीन पर गिर पड़ा ।

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Bikash Baruah
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मैं एक अहिंदी भाषी हिंदी नवलेखक के रूप मे साहित्य साधना की कोशिश कर रहा हू और मेरी दो किताबें "प्रतिक्षा" और "किसके लिए यह कविता" प्रकाशित हो चुकी है ।

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