** क्षणिका **

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- अन्य

ऐ चाँद मेरे
मैं तुझ तक
पहूंचूं कैसे
निगलने को है
बादल परछायी मेरी
डसने को नागाकृति
बहुत विकल है
चल आ
अब ज़मी पर
उतर मुझसे मिल
अरे यूं
मुस्कुराता क्यूं है
मेरी मजबूरियों को समझ
या फिर
मैं गाऊं बादल राग कोई
और
आग लग जाये
इस अवरोध पथ में
तुम पिघल कर
मुझसे आ मिलो
या फिर
आग की भेंट चढ़ जाओ तुम
और मैं मुस्कुराऊँ
अपनी विवसता पर
क्या ये
तुमको अच्छा लगेगा
और मेरे
हृदय की शीतल आग
कभी शांत हो पायेगी
तुम्हारे बिना
👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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