क्यों लिखूँ पत्र

हेमा तिवारी भट्ट

रचनाकार- हेमा तिवारी भट्ट

विधा- लघु कथा

"मानस बेटा!चलो कल के हिन्दी टेस्ट का रीविजन कर लो|पत्र याद कर लिया या नहीं" रूचि ने देखा कि मानस फोन में गेम खेल रहा था|उसने मानस के हाथ से फोन लिया और उसे प्यार से समझाया,"बेटा टेस्ट चल रहे हैं आपके और आप गेम खेल रहे हो"
मानस झुँझला कर बोला,"मुझे नहीं याद करना पत्र,उसे क्यों याद करूँ जो मैंने देखा नहीं,जो मैं करता नहीं उसे मैं रट कर कैसे लिखूँ कि मैंने ऐसा किया|एक तरफ तो आप कहते हो कि समझ के और अपने आस पास से जोड़ के पढ़ा करो,पर जो आस पास हो रहा है और जो सच है अगर मैं वो लिखूँगा या सुनाऊँगा तो क्या मैं पास हो जाऊँगा"रूचि बेटे की इस प्रतिक्रिया पर अचंभित थी,पर उसने अपने को संभालते हुए मानस से विस्तार से समस्या जाननी चाही|मानस ने मासूमियत से पूछा,"माँ यह बताओ क्या आप पत्र लिखती हो,क्या कोई आजकल पत्र भेजता है,मैंने तो आज तक देखा भी नहीं कि पत्र कैसा होता है और मेरे दोस्तों ने भी नहीं देखा फिर मैं रट कर यह कैसे लिखूँ कि 'मित्र तुम्हारा पत्र मिला पढ़कर पता चला कि तुमने परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ अंक पाये हैं|'रूचि ने प्यार से कहा,"बेटा यह तो तुम्हें पत्र में लिखना ही पड़ेगा क्योंकि तभी तो तुम शुभकामना दोगे…"मानस बीच में रोकते हुए बोला,"माँ लेकिन मैं तो फोन से शुभकामना देता हूँ और आजकल तो सभी लोग फोन से ही संदेश लेते और देते हैं फिर पत्र कोर्स में क्यों हैं फोन मैसेज या फोन एटीकेट्स कोर्स में क्यों नहीं हैं ताकि हमें इस तरह का झूठ तो रटना और लिखना न पड़े कि 'तुम्हारा पत्र मिला'
रूचि सोच में पड़ गयी थी आखिर मानस गलत भी तो नहीं कह रहा था|

✍हेमा तिवारी भट्ट✍

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हेमा तिवारी भट्ट
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लिखना,पढ़ना और पढ़ाना अच्छा लगता है, खुद से खुद का ही बतियाना अच्छा लगता है, राग,द्वेष न घृृणा,कपट हो मानव के मन में , दिल में ऐसे ख्वाब सजाना अच्छा लगता है

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