क्यों न होली इस बार हम कुछ यूं मनाये…

अरविन्द दाँगी

रचनाकार- अरविन्द दाँगी "विकल"

विधा- कविता

क्यों न होली इस बार हम कुछ यूं मनाये,
जो बिछड़े थे हमसे कभी उन्हें साथ लाये,
जो रूठे थे हमसे क्यों न पास आये,
जो है गैर हमसे उन्हें भी अपना बनाये,
क्यों न होली इस बार हम कुछ यूं मनाये।।

मन के सारे द्वंद्व इस बार मिट जाये,
गलतफहमियां मेरी तेरी सब रुखसत हो जाये,
अपना पराया भेद सब मन से हट जाये,
अनजानी गलतियों को माफ़ कर जाये,
क्यों न होली इस बार हम कुछ यूं मनाये।।

क्या हिन्दू और क्या मुस्लिम ये भूल जाये,
मिलकर गले इक दूजे से बस अपने हो जाये,
रंग होते सारे कुदरत के ये मान जाये,
क्या केसरिया क्या हरा मिल हम गुलाल लगाये,
क्यों न होली इस बार हम कुछ यूं मनाये।।

धर्म है अगर कोई तो उसका मर्म जान जाये,
वतन है अपना एक हिन्द क्यों न साथ आये,
क्या मजहब क्या जातिवाद हम इंसान हो जाये,
लहू है रंग एक फिर क्यों न मानवता अपनाये,
क्यों न होली इस बार हम कुछ यूं मनाये।।

वो जीते या तुम जीते मन में न कड़वाहट लाये,
भले हो दल अलग़ देशहित क्यों न साथ आये,
राजनीति न इस बार राष्ट्रनीति अपनाये,
छोड़ फ़ुट की बातें क्यों न विकास कर जाये,
क्यों न होली इस बार हम कुछ यूं मनाये।।

रूठा है कोई यार क्यों न उसे मना लाये,
आने को साथ एक क्यों न छोटे बन जाये,
शांति और एका की क्यों न मिसाल बन जाये,
भारत है एक न की बटा हुआ ये दुनिया को दिखलाये,
क्यों न होली इस बार हम कुछ यूं मनाये।।

✍कुछ पंक्तियाँ मेरी कलम से : अरविन्द दाँगी "विकल"

(होली प्रेम सद्भावना महोत्सव की संपूर्ण भारतवासियों को हार्दिक शुभकामनायें…💐💐🙏)

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जो बात हो दिल की वो कलम से कहता हूँ.... गर हो कोई ख़ामोशी...वो कलम से कहता हूँ... ✍अरविन्द दाँगी "विकल"
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